Wednesday, December 17, 2014

लहू में भीगा अखबार

(नई दुनिया - १६ दिसंबर २०१४ )


सुबह -  सुबह
लहू में भीगा अखबार 
शब्दों में कैद आर्तनाद 
चीख-पुकार 
सिसकियों के साथ 
मानवता का हाहाकार 
बढ़ रही 
दिन प्रति दिन क्रूरता 
निर्दोषों के प्रति अत्याचार 

हर दिन नए सिरे से 
नृशंशता, बर्बरता, अमानवीय व्यवहार 
हम जहाँ भी हों 
हो रहे हैं, एक व्यापक त्रासदी के शिकार 

कब तक चलेगा ये आत्मघाती तांडव ?
क्यूँ है ये विध्वंस बढ़ाता विप्लव ?

क्या सुरक्षा होगी 
जब एक हाथ से दूसरा हाथ काटा जाए ?
कैसे बचेगा कोई 
जब अमृत के नाम जहर बांटा जाए ?

हम क्या पहुँच रहे हैं अंतिम छोर पर ?
कितना भरोसा रहे सुरक्षा की डोर पर ?


कैसे सुरक्षित होकर रहे धरती माँ का हर लाल 

कैसे बदले मासूमों को भूनती यह जघन्य ताल ?

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दर्द, प्रार्थना, सहानुभूति, संवेदना के साथ
अशोक व्यास
१६ दिसम्बर २०१४

पेशावर: आर्मी स्कूल पर आतंकी हमला, 84 बच्चों समेत 104 लोग मरे

Tue, 16 Dec 2014 16:14:27 | World Hindi News
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Sunday, December 7, 2014

आत्मतुष्टि


"किसी मान्यता को हम देवता नहीं बनाते हैं,
आत्मा को देवता बनाते हैं,
(कर्म ) आत्मार्थ होना चाहिए,
आत्मतुष्टि आ रही है क्या?"

स्वामी श्री ईश्वरानन्द गिरी जी महाराज 

(प्रवचन '"अवतरण", अहमदाबाद, जुलाई १०. २०१४ से लिया गया वाक्य )

Saturday, December 6, 2014


जीवन के इस जादू में 
इच्छाओं का जंगल है 

आँख -२ में अंतर है 
जो सच है, वो ही छल है 

वो दिखता ही नहीं कहीं 
जिससे सारी हलचल है 

बैठ सका जो निश्चल है 
उसे दिखा चिर चंचल है 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 

मुक्त जो है


लो छलकाऊँ 
नई उमंगो का  स्वर्णिम जल 
मुक्त जो है 
हो ही जाता है वो निश्छल 
अपने से 
अपनों को यूँ भी मिलता बल 
सत्य के आधार से 
संकल्प हो जाता है उज्जवल 


अशोक व्यास 
 न्यूयार्क,अमेरिका २१ जनवरी २०१४ 

अनंत का नम स्पर्श


रुकता नहीं 
रुक रुक कर भी 
चलता जाता है 
एक कुछ 
भीतर मेरे 
जिसके संकेत पर 
देख देख कर उसको 
सुन्दर हो जाता है 
हर संघर्ष 

हर पीड़ा के पार 
पहुँच कर 
लगता है 
हो गयी अनावृत 
उसकी स्वर्णिम आभा 
कुछ और अधिक 
पहले से 

आश्वस्त आधार पर भी 
ना जाने कैसे 
रच देता वह 
कुछ ऐसे कम्पन्न 
की मिल जाता मजा 
लड़खड़ा कर सँभलने का,

विराट की 
विनोदप्रियता पहचान कर 
कभी कभी 
अनंत का नम स्पर्श 
झलका है 
मेरी मुस्कान में भी 
और तब तब 
कृतकृत्य हुआ हूँ 
पहले से कुछ ओर अधिक 

इस धन्यता पर 
सवाल उठाते सन्दर्भ 
छीन लेना चाहते 
मुझसे 
परिपूर्णता का बोध 
और मैं 
द्रौपदी के चीर सी 
अनवरत श्रद्धा से 
उसकी मर्यादा बचाना चाहता 
अपने भीतर 
जिसका नाम शाश्वत सत्य है 
जुलाई १३ २०१४ 

एक छटपटाहट



1
सुबह से शाम तक 
एक बगूला सा उठता है 
एक लहर ऐसी 
जिसको किनारे की ओर नहीं 
आसमान को छू लेने की 
ज़िद है 
और मैं 
चारों दिशाओं में 
तलाशता फिरता 
वो छड़ी 
जिससे छूकर 
शांत कर दूँ इस लहर की 
२ 
लहर में 
शामिल है 
वो सब जो दिखा 
पर उससे ज्यादा वो 
जो रह गया अनदेखा 
वो सब जो हुआ 
पर उससे ज्यादा वो 
जो रह गया अनहुआ 
लहर में 
छुपी है 
एक छटपटाहट 
और 
अपने आपको 
फिर से सहेजने, संवारने 
सँभालने की चाहत 

 ये कौन है 
जो बदल कर 
"सही होने का अर्थ'
सहसा 
बड़ा सा प्रश्नचिन्ह लगा कर 
मेरे अस्त्तित्व पर 
 कर देता है मुझे 

३ 
रेगिस्तान के 
एक अंदरूनी हिस्से में 
होंठों पर जमी पापड़ी से 
रेत हटाता 
दूर 
मरीचिका देख कर 
मुस्कुराता 
हांफता 
गिरता 
चुपचाप 
विराट रक्षक के आगे 
गिड़गिड़ाता 
पर 
हार मानते मानते 
फिर एक बार चलने लगता 
थका- थका लड़खड़ाता 
कैसे रिश्ता है 
उम्मीद से मेरा इसे कभी 
छोड़ नहीं पाता 

१७ जुलाई २०१० 


चलो छोड़ दी पतवार


चलो छोड़ दी पतवार 
मैं तो गया फिर हार 
अर्पित सर्वस्व तुम्हारे द्वार 
तुम ही करवाओ पार 
२ 
आर्थिक प्रश्न माथे पर सवार 
नहीं देखने देते अपना विस्तार 
क्षुद्रता का बंदी हुआ मन 
कैसे जाए कसमसाहट के पार 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 

२ 

छम छम उल्लास


 यह दिन सुन्दर 
आलोक लिखे निश्छल 
पल पल 
पावन 
आनंद सरल,

फिर से 
गढ़ूं 
स्वयं को ,
उमड़े 
छम छम उल्लास 
तरल ,

अनावश्यक 
हटा दूँ वह सब 
अनंत संग नित्यसेतु को 
जो जो 
करता ओझल 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 

तुम्हें खोने का डर




१ 
कितना सा फासला है
 मेरे तुम्हारे बीच
 यही जीवन-मृत्यु सा 
और 
ठान लिया है मैंने 
मिट कर नहीं 
अमिट होकर ही 
मिटाना है 
फासला तुमसे 

२ 
बिना 
बदले भी 
कुछ तो 
होगा न 
मुझमें ऐसा 
जिससे मेल खाती हो 
लय तुम्हारे सार की 

३ 

मैं 
हर रोज 
उस पार्क की बैंच पर 
बैठता हूँ 
मिलने तुमसे 
जब 
जा चुकती हो 
बैंच से तुम 
मिल कर मुझसे 

४ 

अब नहीं है 
साथ साथ भाग कर 
चट्टान के छोर से 
दूर दूर तक देखते हुए 
हाथों की अँगुलियों में 
सृष्टि फंसाने का समय 
अब 
धमाकों के बीच 
जान बचा कर 
भागना है हमें,
ऐसे में 
औपचारिकता कैसी 
खोया यदि 
एक दूसरे का चेहरा 
जो रो रहा होगा कहीं 
वही जीवित होगा 
लिखता हुआ 
आंसूओं से 
एक खोया हुआ जीवन 

५ 

सुनो 
तुम्हें खोने का डर 
अपने आप को खो देने के डर से बड़ा है 
मेरे लिए 

लिखते हुए यह बात 
हो गया हूँ निडर 
और आश्वस्त की 
अब कोई गोली 
नहीं कर सकती हम पर असर 

यह 
जो एक विशेष सुरक्षा कवच
याद दिलाता है 

प्यार 
वह वज्र है, जो 
हर हमले से बचाता है 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क , अमेरिका 
दिसम्बर २०१४ 





आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...