Wednesday, October 22, 2014

अब भी होता है ऐसा


(स्थान- बीकानेर हाउस, आबू पर्वत) चित्र - अशोक व्यास 

१ 
अब भी होता है ऐसा 
दिन ऐसे 
जैसे नया 
नया यानि की 
सोचना होता है 
हूँ कहाँ 
जाना कहाँ है 
क्यों जाना है 
किसलिए जाना है 
सोचना होता है 
इस दिन का 
क्या बनाना है 
इसके उपलब्ध होने का मूल्य 
कैसे चुकाना है 

२ 

अब भी 
होता है ऐसा 
जाने हुए को फिर से जानने में 
एक नए आविष्कार का बोध होता है 
वो जो हमेशा साथ रहा है 
उसके पास होने का 
एक नया अहसास होता है 

मैं 
अपने घर से 
नवजात शिशु की तरह निकलता हूँ 
दिन ढलता जाता है 
पर मैं नहीं ढल पाता हूँ 
मुझमें ये कैसा सूरज है 
जो कभी न अस्त होता है 

अब ये जो शब्दों के बीच में 
नए पुष्पों वाले पौधे 
जो भी बोता है 
जिसको देखे से 
अनवरत मुक्ति का 
परिचय होता है 
कैसे उसका नाम लूँ 
जिसके नाम से 
नाम और रूप का 
ये बंधन खोता है 

३ 

अब जब 
नूतनता की लय 
में 
मेरा नित्यनूतन रूप 
उजागर होता है,
न भय, न संशय 
उसकी अनुग्रह किरण में 
आश्वस्ति का सागर सा 
छुपा होता है 
अब न जाने क्यों 
अक्षय  आनंद के स्त्रोत सा लगता है 
यह एक वाक्य पुराना 
की 
जो होता है 
अच्छे के लिए होता है 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२२ अक्टूबर २०१४ 




Thursday, October 16, 2014

शुरू हो चुका है नाटक


 खेलने एक नाटक 
धकेला तो गया है मंच पर 

पर बताया तो नहीं गया 
कब हटेगा पर्दा 
 कहाँ बैठे हैं दर्शक 
और 
यह भी तो नहीं पता 
कब मंच से उत्तर कर 
बैठ जाना है 
दर्शक दीर्घा में 
 
अवसर जो है उपलब्ध 
पहचान इसके महत्त्व की
आई नहीं साथ 
 
शुरू हो चुका है नाटक 
बीत रहा है समय 
 
लेखक - निर्देशक सब 
बैठ गए हैं छुप कर 
पात्रों के भीतर 
फिर भी 
अंतिम दृश्य तक 
पहुँचते पहुँचते 
अस्पष्टता 
अपनी भूमिका के प्रति 
बनी रह जाती 
ज्यों की त्यों 
ऐसा क्यों ?
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
अक्टूबर १६, २०१४

Wednesday, October 15, 2014

वह जो समर्पित है


समय है 
संयोग है
या  
समझ का सही उपयोग है 

सफलता का रहस्य ढूंढने वाला विश्लेषण 
कभी भी 
सर्वकालिक समाधान तक 
नहीं ले जा सकता 

हर बार 
एक नूतन किरण 
अनिश्चय की 
आ धमकती है 
सम्भावनाओ के आँगन में 
नए नए रंग खिलाती 
नए नए दृश्य दिखलाती 

विश्लेषण में 
जो कुछ मिलता है 
उसका जीवन अल्प है 
समर्पण में 
वह मिलता है 
जो निर्विकल्प है 

विश्लेषण करने वाला 
समर्पण करने से 
दूरी बनाये रखने को 
बाध्य है 
और 
वह जो समर्पित है 
परम आनंद में मगन है 
उसके लिए तो 
शुष्क विश्लेषण 
असाध्य है 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१५ अक्टूबर २०१४ 


Saturday, October 11, 2014

अमृत की बूंदों का स्वाद


प्रश्न ये सारे 

जीवन मृत्यु के 

अतीत से वर्तमान और भविष्य को जोड़ते सूत्र में 
अपने बारम्बार बदलते प्रतिबिम्ब देख कर उभरने वाले 

और 
यह प्रश्न 
जो प्रश्न उठाने के औचित्य पर भी 
प्रश्नवाचक चिन्ह लगाते हैं 

समझ में नहीं आता 
हम 
जिन जिन सतहों के बीच 
अपना स्थान बनाते हैं 
वहां वहां 
बंधे बंधे क्यूँ रह जाते हैं 


२ 

बात जब फिसलती है 
कृपा के आलोक में 

घर्षण रहित मन 
अपेक्षाओं के तराजू में 
तौलता है 
अमृत की बूंदों का स्वाद 

और 
 अनुग्रह बरखा में  
छूट जाता
 आशा - निराशा का खेल ,

मुक्त विस्तार में मगन
तन्मय मन 
सुनने सुनाने से परे
अनंत की महिमा
में रम जाता है 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 


आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...