Thursday, July 31, 2014

एक शिथिलता सी

 
यह क्या है 
एक शिथिलता सी 
निश्छल हो रहने अडौलपन में रमने 
चुप धरे रहने का मन 
 
इस ठोस सी चुप्पी में 
क्या नया रूप
 ढूंढ रहा है जीवन
या गति  साथ का 
हो रहा है मंथन 

यहाँ 
मैं भी खड़ा हूँ 
प्रवेश द्वार पर 
मेरा होना 
टंगा हुआ है 
जैसे  कगार पर 

शायद मौन में 
बन रहा हो 
अर्थयुक्त होने का गीत 
शायद 
मेरी अनुपस्थिति में ही 
प्रकट होता सार-संगीत 

यह निश्चलता 
यह जड़ता से पल 
शायद पुनर्व्यस्थित 
कर रहे 
भीतर की हलचल 
 
शायद इन पलों में 
जब मैं गढ़ा जा रहा हूँ 
रुके-रुके भी 
गंतव्य की और बढ़ा 
जा रहा हूँ 
शायद इस तरह 
आ पाऊंगा 
इस मुगालते के पार 
की मेरे किये से 
चल रहा है मेरा संसार 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
जुलाई २०१४

Wednesday, July 30, 2014

एक जादुई पिटारा



वो फिर
उस पेड़ के नीचे
पहाड़ी की पीछे
लेट गया
अपनी आँखें मींचे

न धरती
न आकाश
कौन है वो
जिसकी है तलाश

वो फिर
धीमे धीमे
अपने अदृश्य नगर में
करते हुए सैर
बुलाता रहा उसे
जिससे माँगता रहा
अपनी खैर


तुम ओ अज्ञात
रहते हो साथ साथ
दिन और रात
पर क्यूँ नहीं दिखाते
मुझे अपनी औकात

कह दो
अगर मैं नहीं हूँ लायक
बता दो
मैं यदि नहीं हूँ नायक

लय के साथ
उसे हसीन लग रहा था अपना आक्रोश
न जाने कैसे
उसके सामने, रूमानी सा लग रहा था अपना जोश
उससे तार जुड़ते ही
ना जाने कैसे, काफूर हो चला असंतोष
उसे लगा, शेष जो हो सो हो
मिल गया है, सबसे कीमती, ये अपना होश

आँखें खोल कर देखा
चिड़िया चहचहाई
उसे अपने घर की
गरमागरम चाय याद आई

वह मुस्कुराया
उठा और घर की तरफ कदम बढ़ाया
इस तरह फिर एक बार पेड़ की छाया ने
एक भूत से
उसका पीछा छुड़ाया,
उसकी मुट्ठी में है भविष्य
उसकी साँसों में
 ये आश्वस्ति देता सन्देश पहुंचाया


लौटते हुए
शब्दों ने उसे हाथ पकड़ कर घर पहुंचाया
उसने अपने साये से
कविता का परिचय इस तरह करवाया
ये कविता नहीं
लड़खड़ाते आदमी का सहारा है
मेरे भीतर की टूट फूट को मिटाता
एक जादुई पिटारा है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३० जुलाई २० १४ , बुधवार




Tuesday, July 29, 2014

यह जो खालीपन है


यह जो खालीपन है 
खाली नहीं है 
इसमें भरा है 
कभी निराशा का एक टुकड़ा 
या अनदेखी हार का एक कतरा 
या फिर, अपने ऊपर से भरोसा हटाने वाले लम्हे की 
लपलपाती तस्वीर 

यह जो खालीपन है 
खाली नहीं है 
इसमें सुगबुगाती है एक सम्भावना

तुम अपने भीतर

अब भी देख पाते हो 
टिमटिम करते विश्वास का चिराग

सुन पाते हो 
अपनी अदम्य चाहत में 
कुछ कर दिखाने की पुकार 

यह जो खालीपन है 
यह तुम्हारी निर्माण प्रक्रिया का 
एक महत्वपूर्ण अंश है 

इस तरह धीरे धीरे 
 अपने सीमित घेरे से बाहर निकलने का 
ये आंदोलन सा 
जो उभर रहा है तुममें

कैसे छुपा रहा ये सब 
खालीपन की कोख में ?

अशोक व्यास 
न्यूयार्क अमेरिका २९ जुलाई २०१४ 

Thursday, July 24, 2014

तुम हो न सर्वश्रेष्ठ कवि ?



१ 

और फिर 
उसने नन्ही चिड़िया से बतियाते हुए 
अपने दिल पर पड़ा पत्थर हटाया 
और चिड़िया के सामने माना 
की वो दुनियां का सर्वश्रेष्ठ कवि नहीं है 

२ 

चिड़िया ने तिनके का मोह छोड़ते हुए 
अपना घरोंदा बनाने का कार्य स्थगित करते हुए 
उससे कहा 
"वह बात, जो सारी दुनिया पहले से जानती है 
तुम भी जान और मान लेते हो 
तो तुम दुनिया से साथ कदम मिलाने लायक बन जाते हो"

३ 

अपनी चोंच से निकले तिनके को हवा में उड़ता देखते हुए 
चिड़िया ने फिर कहा 
"पर तुम्हारी विशेषता इसमें है 
की तुम दुनिया के खिलाफ 
अपनी उन मान्यताओं की रक्षा करो 
जो सिर्फ तुम्हारी अपनी हैं
तुम जानते हो 
संसार में तुम्हारे लिए 
तुम्हारे जैसा कवि 
और कोई न है 
न हो सकता है 
फिर क्यों इंकार करना 
अपनी इस खूबी को चाहे मत बेचो 
चाहे इससे नाम न कमाओ 
पर अभिव्यक्ति के इस आलोक की पावनता 
दुनियां की आँखों से देख कर 
न घटाओ, न बढ़ाओ "

४ 

हो तुम सर्वश्रेष्ठ या नहीं 
यह प्रश्न ही नहीं 
श्रेष्ठ हो तुम 
क्योंकि जिस भूमि से कविता उपजती है 
वहां तुम्हारे सिवा 
न और कोई है 
न हो सकता है 

५ 

तुम्हारी कविता 
अपने आप से जुड़ने के प्रयासो के पदचिन्ह हैं 
इन पदचिन्हों के गौरव को न झुठलाओ 
इनके द्वारा प्रदर्शित दिशा को देखो 
इन संकेतों से प्रेरणा प्रसाद पाओ 
जहाँ भी हो 
वहां से आगे और आगे बढ़ जाओ 

६ 

कविता कोई बाजारू इश्तिहार सा पोस्टर नहीं 
न ही किसी की बैलेंस शीट का समीकरण 
कविता तुम्हारी साँसें हैं 
तुम्हारा जीवन है 
तुम्हारा होना है 
अपने होने की महिमा का मूल्यांकन करते हुए 
अपनी हर सांस में 

विराट के विध्यमान होने की सजगता 
क्यों न मानो ?
क्यों न इस विलक्षण तथ्यात्मक सत्य का उत्सव बनाओ ?

७ 

कविता कभी बहती नदी है 
कभी सागर की आश्वस्त दृष्टि 
एक सूक्ष्म सतह का संवेदनशील आधार 
जो इस निष्ठां को बल देता है 
की तुममें है कुछ ऐसा 
जो अद्वितीय है 
जो अनूठा है 
जिससे इस विश्वास का आलोक निःसृत है 
की 
तुममें अनुस्यूत है वह पात्रता 
जिसे लेकर तुम जहाँ हो 
वहां से ऊपर उठ जाओ 

८ 

कविता अनंत तक उठने की सीढ़ियों का पथ है 
तुम कविता हो 
तुम अनंत हो 
तुम सीढीयां हो 

जीवन तुम्हारे सर्व्यापी होने की घोषणा करने के लिए 
जिस संरचना को अपनाता है 
उसका नाम कविता है 

९ 

कहो 
तुम हो न सर्वश्रेष्ठ कवि ?

चिड़िया ने पूछा इस बार जब 
चिड़िया नहीं 
दिखाई दिया कोई और 

मेरी कविता मुझे  इस 'कोई और' के दर्शन करवाती है 
मैं नहीं बनाता कविता, कविता ही मुझे बनाती है 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२४  जुलाई २०१४ 




आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...