Saturday, June 21, 2014

यह दृष्टि विस्तार की

आस्था का आलोक दिलाये है सम्बल 
बीत ही जाएगा, पीड़ा सा यह पल 
सांसों में सहेज भाव शाश्वत शीतल 
पावन करता हर अनुभव को गंगा जल 

वह जो है एक 
गाता जो मुझमें
शब्दातीत स्वर्णिम आलोक सा 
कभी कभी 
पोंछ कर सारे प्रभाव 
एकदम स्वच्छ, निर्मल, नूतन 
बना देता मुझे 
प्रस्तुत सकल व्योम का 
स्वागत करने 
इस क्षण 
परे हर पहचान के, नहीं जानता 
अपने इस सन्दर्भ मुक्त स्वरुप को 
किस संज्ञा से परिभाषित करूँ 

बस इतना जानता हूँ 
जिसके होने से मेरा होना है 
वह उंडेल रहा 
वात्सल्य  मुझ पर

 सहेज कर 
यह दृष्टि विस्तार की 
जिस तरफ भी 
देखता हूँ
दीखता है  
एक वही 
जिसके होने से है 
मेरा होना 
ॐ 
२८ मई २०१४ 

परिणय बंधन


आपसी  स्वीकरण का 
सामाजिक उत्सव 
अनंत का अभिनन्दन है 

एक स्फूर्तिदायक पदचाप 
उसकी कृपा की 
जिससे मन, सुमन है 

भाव शुद्धि के साथ 
स्व-मिलन में सहायक, पावन 
परिणय बंधन है
गृहस्थी यानि 
रसमय संगम विविध अनुभवों का  
पग- पग परमात्म मिलन है 


अशोक व्यास, न्यूयार्क, अमेरिका 
२४ मई २०१४ 
(मनन और नताशा के लिए आशीष और शुभ कामनाओं सहित)

आभार पुष्प


लौटा दूँ कैसे 
तुम्हें 
वह करूणा 
वह निश्छल प्रेम 
वह शुभ भाव वर्षण 

आभार पुष्प 
हाथ में लिए 
सौंपता हूँ 
सूर्य किरण को 
आश्वस्ति है 
रूप समेत कर भी अपना 
हो जहाँ भी 
अलोक है सहचर 
सन्देश मेरा 
प्रेम भाव, आभार सरस 
पहुँच ही जाएगा 
तुम तक 
जहां भी हो तुम 

ॐ 
२८ मई २०१४ 
(दिवंगत प्रेम मूर्ति शांति प्रसाद मूथा जी(जोधपुर) को समर्पित )

Wednesday, June 11, 2014

परिचय


हम जहाँ हैं 
उस जगह का परिचय 
वहां का पता ही नहीं 
इस बात से भी होता है 
की हमें 
अपना पता है या नहीं है 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
११ जून २०१४ 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...