Saturday, March 29, 2014

यह सब जो खेल है काल का




यह सब जो खेल है काल का 
परिचय है तुम्हारी ही ताल का 

कहो अनंत रूपों के खिलाड़ी 
मर्म क्या है इस धमाल का 

२ 

आज पर्चा खुला नये साल का 
नया रूप दिखा अपने हाल का 

कुछ रहस्य खोल गया उस पर 
प्रकट होना मकड़ी के जाल का 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
मार्च २९ २०१४


 


कैसे करूणामय हैं वो गुरुवर



ध्यान जिस तरफ रहता है निरंतर 
उसके स्वरुप में आनंद निर्झर 

वह एक अनादि, अनंत, शाश्वत 
उसकी सन्निधि का भाव है सुन्दर 

उसमें रमने के लिए ही सारा खेल 
उसकी सुमिरन में आनंद का सागर 

हर दिशा में उसकी महिमा का गान 
उसकी छवि से मुक्ति उजागर 

ध्यान उसका,  प्रसाद है जिनका 
कैसे करूणामय हैं वो गुरुवर 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
मार्च २९ २०१४
 
 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...