Saturday, August 24, 2013

वैभव शुद्ध आनंद का


अब यह जो
अदृश्य झरना सा 
बहता है 
शांत, स्निग्ध, सौन्दर्य का भाव सुनाता 
यह 
स्त्रोत आनंद का 
है तो गतिमान 
फिर भी 
इसके ठहर जाने की चाह को 
जब देखता हूँ 
लगता है
शरारती बच्ची सा 
चेहरा कामना का 
हंस कर 
मुट्ठी भर हवा से 
भर देता उसकी झोली 

२ 

यह जो है 
समागम सा 
पूर्णता का पूर्णता में 
यहाँ कौन गाने वाला 
कौन नर्तक 
किसके हाथ बजे है मृदंग 

अभेद में भेद का 
यह स्वांग 
आवश्यक है 
उत्सव उत्पन्न करने 

वह जिसने 
बनाया 
जीवन उत्सव 
क्या वह जानता था 
एक दिन 
गायक, नर्तक और वादक 
अलग अलग दिशाओं पर 
अपना आधिपत्य मान कर 
समन्वय को ही 
एक दुर्लभ समीकरण बना देंगे 
पृथ्वी पर 

३ 

अभी कुछ और दूर 
चल सकता हूँ 
हवाओं के गीत सुनता 
अभी सुन सकता हूँ 
कुछ और कहानियां क्षितिज से 
अभी 
नहीं हुआ शेष 
यह 
निथर कर मक्खन का 
सतह पर आना 

वह 
जिसने मथनी चला कर 
उजागर किया है 
मक्खन मेरे भीतर 
उसे ही सौंपना है 
यह 
वैभव शुद्ध आनंद का 

अशोक व्यास 
२४ अगस्त २०१३

Thursday, August 22, 2013

असीम संवेदना का अनहत नाद


अचानक 
एक कुछ सरक जाता है 
छुप देता है 
कुछ करने, बनने, रचने, जताने की चाह 
 
एक शिथिलता 
एक ठहराव 
स्पंदन अनंत के 
यह धीमे धीमे 
उमगा देते हैं 
राग एक महीन, मंथर, अचीन्हा 
 
अपने आप में गुम 
कई शताब्दियों का गुलकंद चखता 
अधमुंदी आँखों से देखता 
बाल आदित्य की लालिमा 

तृप्त हूँ 
छूकर इस क्षण को 
जिसमें सम्माहित हैं तीनो काल 

यहाँ क्यूं कर पुकारूं 
उसे 
जो सरक गया है 
जिसके साथ चली गयी है 
कामनाओं की धमकती ताल 
 
मैं 
हंसता-खिलखिलाता 
पूर्ण निष्काम 
अनुपस्थित उपस्थित सर्वत्र 
 
विरोधाभासों का सरस सेतु 
सुनता-सुनाता 
असीम संवेदना का अनहत नाद 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२२ अगस्त २०१३
 
 
 

Monday, August 19, 2013

विस्तार की टोह लेता



१ 
एक ये पल 
जब फूटता है प्रकाश 
विस्तार की टोह लेता 
भागता हुआ 
छू छू कर 
सब कुछ स्वच्छ कर देने की आतुरता लिए 
यहाँ वहां 
कर देता हूँ उजियारा 
न जाने कैसे 
कर्म और गति के साथ भी 
शांति और समन्वय से 
मेल बनाए रखती 
अद्भुत 
सृजनात्मक धारा 
२ 
एक इस पल में 
बनने बनाने के सपने भी 
पोषित करते हैं 
मेरी पूर्णता 
हर आगत के स्वागत में 
तत्पर हूँ जैसे 
प्रसन्नता की किरणों से परिपूर्ण 
३ 
अभी इस पल में 
जब 
शब्दों के साथ 
ले रहा अपना मानस चित्र 
तुम भी आस पास हो मेरे 
यह कह देना 
हँसते हँसते 
कितना सहज हो गया है 
जैसे 
एक इस पल में 
पूरी सृष्टि के साथ 
 अपने सम्बन्ध का उत्सव 
मना रहा हूँ मैं 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१९ अगस्त २०१३

Thursday, August 15, 2013

अपनी दौलत आज लुटाऊँ


शब्द दीप से 
पथ उजियारा 
करती उसकी 
करूणा धारा 
उसके गोद 
बनी है संबल 
जब जब मैं 
जीवन से हारा 
२ 
कभी रहे जो 
आँख का तारा 
उससे भी 
ना मिले सहारा
काल प्रवाह 
बदल देता है 
संबंधों को 
कितना सारा 

३ 

बात बात में 
सच आ जाए 
रेत बना एक घर 
ढह जाए 
अपनेपन का खेल 
गज़ब है 
खेल खेल में 
खेल छुडाये 
४ 
अब कैसे पहचान बताऊँ 
मैं जिसका नित ध्यान लगाऊँ 
उसका कहना है, चुप होकर 
कहने सुनने से टर जाऊं 

५ 

अपनी दौलत आज लुटाऊँ 
सब तज कर खाली हो जाऊं 
स्नान करूँ गंगा मैय्या में 
अपने कालजयी घर जाऊं 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
८ अगस्त २०१३ 

बस तुकबंदी का खेल


१ 
और कुछ नहीं, बस तुकबंदी का खेल 
शायद खेल खेल में हो ही जाए मेल 

इधर उधर भागते ख्यालों को आखिर 
पटरी पर ले आये शब्दों की रेल 


२ 

अदृश्य हो गयी सपनो की रेल 
चुकने लगा है दिए का तेल 
विलीन अज्ञात लोक में लौ 
करके तेज़ हवाओं से मेल 

३ 

अब ये कौन सा तल है 
जहाँ सब कुछ निर्मल है 
सबके पार देख लेता मन 
शुद्ध, सौम्य और शीतल है 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१४ - १५ अगस्त २०१३
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जो बीत रहा है

 
 

एक दिन के बाद 
फिर एक और दिन 
दिन दिन 
यह कुछ, जो बीत रहा है 
यह मैं हूँ 
यह समय है 
या 
यही जीवन है ?

२ 

एक परत 
दूसरी परत 
दूसरी के बाद तीसरी परत 
परत दर परत 
अनावरण हो रहा है 
संबंधों के द्वारा 
जिस नूतनता का 
क्या ये तुम हो 
क्या ये मैं हूँ 
या 
ये लुप्त हो जाना है 
उस असत्य का 
जिसे हम 
अपने होने का सत्य मान कर 
खेलते रहे हैं 
खेल जीवन का 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१५ अगस्त २ ० १ ३

Friday, August 9, 2013

पहचान की पुकार


कौन ले आता है अचानक मुझे यहाँ 
जहाँ 
फिर से ढूंढना होता संतुलन 
फिर से गढ़ना होता समन्वय 

धीरे धीरे सहेजना होता बिखरी हुई आश्वस्ति को 
जैसे चित्र पहेली में 
अपने ही हाथ पाँव जोड़ कर 
अपना पूरा रूप रचना पड़े 
चलते चलते 

कौन ले आता है मुझे 
यहाँ 
जहाँ यकायक सब कुछ निःसार सा 
उदासीनता के कुहासे में 
पहचान की पुकार 

पूछता है कोई 
मुझसे मेरा परिचय 
और जैसे 
सत्यापित करना चाहता है 
मैं जो हूँ 
वह सचमुच मैं ही हूँ न 

सत्यापन के इस प्रयास में 
धीरे धीरे 
छूट जाता है 
निरंतरता का एक मधुर रस 
अपने घर में अपने होने का सहज भाव 

सहजता और सन्तुसन प्राप्ति के युद्ध में 
मेरा साथ देते शब्द 
न जाने कैसे 
हर लेते हैं चिंता मेरी 

जगा देते हैं एक गहरी आश्वस्ति 
की 
हो ही जाएगा 
धीरे धीरे 
ठीक ठाक 
सब कुछ 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
९ अगस्त २०१३
 

Wednesday, August 7, 2013

बेखबर होने का नाटक


शायद आज सच कह रहा हूँ 
उस दिन 
मैंने झूठ कहा था 
की खिड़की से मुझे देखती तुम्हारी नज़रों को 
मैंने कभी नहीं देखा 

सच तो ये है की 
मेरे बाल 
मेरी चाल 
मेरे मन का हाल 

सब कुछ देखा किये तुम्हें 
हवाओं में घुल मिल कर 

सच तो ये है की 
तुम्हारे देखने से पहले ही 
ताकती रही थीं 
मेरी नजरें 
खाली खिड़की को 
और 
तुम्हारे आने के बाद 
लगातार 
बना रहा 
बेखबर होने का नाटक
और
इस नाटक का समापन
अपने ही भीतर
जब हुआ
एक दिन
तब न सोचा था
की
तुम्हारे जाने बिना
अपने होने की खबर
तुम्हारे होने से
लेते रहने का सिलसिला
तोड़ कर
अपने आपको फिर से पाने के लिए
बढाए गए दो कदम
इतने मुश्किल हो सकते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
७ अगस्त २०१३

Monday, August 5, 2013

कहने को बात तो ज़रा सी है




कहने को बात तो ज़रा सी है 
फिर हवाओं में क्यों उदासी है 
 
आज की बात में मिलावट है 
मेरे चेहरे पे कल की झांकी है

बच गए टूटने से चुप रह के
फिर लगे है कोई खता की है 

कहने सुनने का है हिसाब अजब 
जहाँ जमा है, वहीं बाकी है 
 
सिमट गया है अपने आप में वो 
ख्वाहिशें अब भी फड़फड़ाती हैं 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
५ अगस्त २०१३
 






 
 

Thursday, August 1, 2013

इतना कुछ जान कर


उसने कितना कुछ दिखलाया 
कभी गोद में उठा कर 
अपनी अँगुलियों से संकेत कर करके 
कभी शब्दों से दिशाबोध जगा कर 
कभी स्वयं विस्तार रूप लेकर 
कभी कर्म क्रीडा से नवसृजन कर 

उसने कितने धैर्य से 
कितनी करूणा से 
दिखलाया कई बार 
परम वैभव सृष्टि का 
और जगाया उत्साह 
स्वयं को समग्रता से अपनाते हुए 
सारे जगत को 
अपना लेने का 

वह प्यार के निश्छल, शुद्ध प्रवाह पर 
सहजता से 
नित्य आसीन 
इतना कुछ जान कर 
इतना कुछ बता कर 
कितना संयमित 
कितना सौम्य 
और 
परम गरिमा के साथ 
तन्मय अपनी पूर्णता में 
ना जाने कैसे 
नित्य मुक्त रहता निराशा से 
यह जान कर भी 
की 
उसके द्वारा 
सौंपी गयी 
दृष्टि का एक लघु अंश भी 
नहीं अपना पाया मैं 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१अगस्त २० १३

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...