Monday, July 29, 2013

आत्मीय अनुराग


 
सहसा 
फिर दिखाई दे रहा आकाश,
बाहें फ़ैल कर 
हो रहीं पंख सी ,
 
तत्पर हूँ 
उड़ान भर कर 
गगन से सम्बंधित 
होने का 
उत्सव मनाने ,
 
२ 
सिंचित अनुग्रह बरखा से 
अंतस 

उमड़ रहा
आत्मीय अनुराग 
 
तत्पर 
विस्तार से एकमेक होने 
 
देख रहा 
छूट रहे बंधन 
 
मुक्त होना 
कितना सहज कर देती है 
उसकी दृष्टि 
 
-------------
 
धुंधले से 
सूर्य देव 
धुल प्रसरित
दूर क्षितिज तक 
मिटाती भेद 
धरा और गगन का 
एक नरम कोमल गिलाफ ओढ़े 
धीरे धीरे 
अंगड़ाई लेकर 
उठने की तैय्यारी में है 
भोर 
 
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 अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२९ जुलाई २०१३ 

Thursday, July 11, 2013

अनंत का निशब्द आलाप


समय के साथ 
अब बंद कर दी है बात 
बस चुप्पी में अपनी 
चले हैं साथ साथ 

चलते चलते 
अपने सम्पूर्णता में 
अपने आप बन जाती है बात 

अब 
यह जो गूंजती है 
सुन्दरता की मद्धम पद चाप 
यह 
पग पग पर उभर आता है 
अनंत का निशब्द आलाप 

बिछा कर अपनी सारी चेतना 
घुल मिल जाता अपने सूक्ष्म तंतुओं संग 
उसके संग, जिससे दिन और रात 

अब 
कोलाहल में भी 
मिल जाता है अक्षय शांति का स्वाद 
वही 
साथ है निरंतर, जिसे नित्य करता हूँ याद 



अशोक व्यास 
११ जुलाई २० १ ३

Wednesday, July 10, 2013

समय का चेहरा


आधे अधूरे जीवन का दर्शन 
एक क्षण 
सहसा छूट गया 
न जाने कैसे 
अब जब 
समग्रता से दीखता है 
समय का चेहरा 
शिथिल हो गयी है 
पकड़ 
स्थितियों के पंजों की 
हर बार 
घेरे है 
मुझे विस्तार 
इस-उस के पार 
यह अनंत का अनवरत आधार 
बोध शाश्वत भोर का 
है किसका उपहार ?

मेरी हर सांस में खुल रहा सृष्टि के सौंदर्य का सार 
और दृष्टि में परम कृपालु के प्रति परम आभार 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१० जुलाई २० १ ३
 

Monday, July 8, 2013

उजियारा खनकदार सिक्का


इस बार 
आकाश से 
उजियारा खनकदार सिक्का 
उतर कर 
आ बैठा उसकी हथेली में 

हाथ की रेखाओं में 
फ़ैल गयी 
सुरमई आभा कृपा की 

उसने 
आनंद के ज्वार में 
खुल कर 
गा दिया 
एक नया गीत अनंत का 
और फिर 
हो रहा 
अपने में सम्माहित 
जैसे 
परे हो चला हो 
होने न होने से 

मौन की माधुरी में घुली 
सहज, शांति, स्निग्धता शाश्वत 
 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जुलाई २० १३

Sunday, July 7, 2013

उसने कहा था


 
 
 उसने कहा था 
जब रास्ते में 
एक टुकड़ा ऐसा आये 
की न चलने का मन हो 
न ठहरने का 
तब मुझे याद करके चलते रहना 

उसने कहा था 
जब मुझे याद करते हुए 
अपने आपको भूल जाओ 
तब ये निश्चित जानो 
मैं मिल जाऊंगा 

उसकी बात साथ रही 
पर अपने आपको भूलना 
कभी हो ना पाया 

अपने को याद रखते हुए 
कई बार 
वजन बढ़ता गया 
और 
अपने नीचे दबने से बचने के लिए 
एक बार जब 
कातरता से उसे पुकारा 
 
तब 
ना जाने कैसे 
हट गया वजन 
संभव हो गया 
अपने से छूटना 
 
और एक निश्छल से क्षण में 
दिखाई दे गया 
सूत्र एक रहस्य का 
 
पूरे रास्ते 
मुझे बाँध कर रखने वाला 
कोइ और नहीं 
मैं खुद था 



अशोक व्यास 
७ जुलाई २० १ ३

Friday, July 5, 2013

भय प्रदेश की भूल भुल्लैया


तो चलते चलते 
अदृश्य हो जाता है 
रथ का सारथि जब 
एक अज्ञात भाव घेर लेता है 
कहीं छूट तो न जायेगी दिशा 
कहीं सरपट भागते पहिये पथच्युत तो न हो जायेंगे 
 और 
किसी अनजानी चोट के काल्पनिक स्पर्श से सहम कर 
व्याकुलता की पगडंडियों पर 
दौड़-धूप कर 
प्रार्थना के निमित्त 
बंद कर आँखें 
किसी आश्वस्त पवन की थपकी से 
आंख खोल कर देखता हूँ 
वहीँ है सारथि 
वैसे ही 
अश्वों की रास थामे 
पलट कर 
मेरी और मुस्कुराते हुए 
मेरी आँखों में टंगे प्रश्न 
'कहाँ चले गए थे' का 
आँखों से ही जवाब देता है 
कहता है 
"मैं तो यहीं था 
तुम ही चले गए थे 
सैर करने
अपने भय प्रदेश की भूल भुल्लैया में


अशोक व्यास 
५ जुलाई २ ३

Tuesday, July 2, 2013

चेतना की परिधि में


 
 
१ 
कविता है या नहीं 
पता नहीं 
बस एक हूक सी
दिखला दूं 
चित्र उसका
उसके 
शब्द तरल पर 
झलकता है 
प्रतिबिम्ब जिसका 
उसे बिन शब्द 
छू नहीं सकता 
 

शब्द तो स्वयं 
अतीन्द्रिय हैं 
चेतना की परिधि में 
और उससे परे भी 
संभव है 
आवागमन शब्द का 
छुपा कर स्वयं को 
शब्दों में 
छोड़ कर अपना 
सीमित होने का आग्रह 
जब 
अपनी इच्छा से 
घुल जाता हूँ 
 शून्य में 
निर्भय, निराकार, निश्छल, 
स्वच्छ, शुद्ध, 
एक अनाम, निर्द्वन्द विस्तार 

अज्ञात निद्रा से उठने 
करवट बदल कर 
आँखें खोलते हुए 
संवाद सेतु जीवित करने 
प्रार्थना के प्राप्य सी 
उतरती है कविता 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२ जुलाई २ ० १ ३

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...