Sunday, June 30, 2013

अपने आप में मगन

 
इस बार 
चर्चा थकान की नहीं 
उत्साह की ही करने को 
तत्पर और कटिबद्ध था वह 
अपने आप में मगन 
झूमते हुए 
अंतिम पग धर 
उसने जाना 
उसका सारा उत्साह 
प्रेम है 
श्रद्धा है 
जिसका उद्गम 
अदि अंत रहित में है 
इस तरह 
अपने आप में निहित 
विस्तार की चेतना लिए 
वह खिलखिलाया 
और फिर 
मुस्कुराते हुए 
उसने जाना 
उसका सारा जीवन 
जो इतने आनंद से परिपूर्ण है 
सौगात है 
एके अज्ञात की 
 
अशोक व्यास 
१ जुलाई २ ३

Sunday, June 9, 2013

यह एकांत

(चित्र- डॉ विवेक भरद्वाज, जोधपुर )

यह एकांत 
अपना सा 
घेर कर मुझे 
चलता है साथ साथ 
सुनते हुए 
मेरी 
हर कही-अनकही बात 

इस एकांत में 
इतना प्यार 
कहाँ से आता है 
ये प्यार मुझे 
किसका पता 
बताता है 

इतनी भीड़ में 
कौन इस एकांत के
कोमल अस्त्तित्त्व को 
बचाता है 


इस नितांत अपने से वृत्त में 
धीरे धीरे 
सारा संसार उतर आता है 
कैसा है ये स्थल 
जहाँ 
न कोइ आता है, न कोइ जाता है 
पर 
संसार का व्यापार 
चलता चला जाता है 


इस एकांत में शरण लेकर 
इतना निश्चल , इतना शांत 
क्या मिल गया है मुझे
शाश्वत का प्रांत 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क अमेरिका 
9 जून  2013

Saturday, June 8, 2013

शुद्ध प्रेम की किरने


गुफा में जाना 
जाकर देर तक बैठना 
अँधेरे में 
अपने आप 
आलोक संचरण का अनुभव 

और 

फिर 
मौन में उभर आता 
सबसे मधुर संगीत 
समन्वित धडकनों के साथ 

असीम स्पर्श से झरती 
मुस्कराहट लिए 

जब 
वह 
उठता 
गुफा से बाहर आने 
कई बार 
यूं हुआ 
की मिट गया गुफा और बाहरी जगत के बीच का भेद 

चलना उड़ने जैसा 
और 
उसे केंद्र बना कर 
वह जो 
बिखरती थीं 
शुद्ध प्रेम की किरने चहुओर 
कौन बनाता और फैलाता था 

वह अद्वितीय आनंद 

मनन करते करते 
सहज ही 
लगता उसे 
जैसे 
वह फिर से 
जा बैठा है 
गुफा में 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जून २ ० १ ३

Friday, June 7, 2013

प्यार की यह लहर


यह जो है 
एक शून्य सा 
 
मंथर गति से
 चलती हुई 
जीवन की लकीर से झनझनाता

इस शून्य में ढूढता हूँ
 
 अपना वह चेहरा
 
 जो शेष रहता है 
पार हर परिवर्तन के 
 
और ढूंढते ढूंढते अनायास ही 
जब छूट जाती है 
ढूँढने की जरूरत 
 
मिल जाता है 
यह एक कुछ 
मिलने और न मिलने से परे का 

इसके साथ 
उतर  जाता हूँ 
ऐसी नींद में
 जिसके भीतर जाग्रति है 
 
और इस जाग्रति में 
ऐसा यह क्या कि 
भेद नहीं रहता 
मुझमें और सूरज में 
 
ऐसा यह क्या की 
मैं अपने आप से 
प्रकट होते 
अनाम उजियारे में 
भीगता 
पुष्ट होता हूँ 
 
भरा हुआ 
अपने अकाट्य होने के बोध से 
छलछलाता हूँ 
प्यार से 
 
और लगता है 
प्यार की यह लहर 
जगत के इस छोर से 
उस छोर तक जायेगी 
 
सबके पास 
अक्षय प्रसन्नता का उपहार पहुंचाएगी 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जून २ ० १ ३

खंडित होने का स्वांग रचाते


कितना विचित्र है 
इस तरह होना 
अपने आप में पूर्ण 
और 
अपूर्णता से व्यवहार करना 

वह स्थल 
जहाँ से जाग्रत है 
बोध पूर्णता का 
अदृश्य ही नहीं अमान्य भी है 
इस समाज में 
जिसकी मान्यताओं को ओढ़ कर 
अपने को कहीं न कहीं छुपाये हुए 
खंडित होने का स्वांग रचाते 

एक दिन 
लौट कर 
छोड़ देते है
उस विचित्रता को 
जिसमें प्रश्न चिन्ह थे अपनी पूर्णता पर 

और 
सहज ही 
अपनी पूर्णता में रमे 
हम औरों द्वारा हम पर लादी पहचान से मुक्त 
तन्मय हो रहते हैं 
अपनी उस पहचान में 
जो कभी बदलती नहीं है 
पर नित्य नई है 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जून २० १ ३

Thursday, June 6, 2013

मुक्ति रचने के लिए


क्यों 
किसके लिए 
कब तक 
सवाल इस तरह की रंगत वाले 
सारे के सारे 
छोड़ कर तो आया था 
उसकी देहरी पर 
पर मिल जाते हैं 
अब भी 
मेरी सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह बन कर 
उभर आते सवाल 
 
और फिर 
उन सबको 
स्मरण करवाता 
उनका सही स्थान 
 
वह मूल 
जहां से सुलभ है 
उनका अभीष्ठ 
 
इस तरह 
पग पग 
मुक्ति रचने के लिए भी 
करना तो होता है 
स्मरण तुम्हारा 
ओ अविनाशी 

तो क्या 
सत्यनिष्ठ जीवन का अर्थ बस 
सजग, सतत स्मरण है तुम्हारा 
जिसमें से झरती है 
गतिमान मुक्ति की सुन्दर धारा 
 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
६ जून २ ० १ ३ 
गुरूवार 

Wednesday, June 5, 2013

बस देखना भर है


 १ 
अब यह भी नहीं 
की 
उसके चले जाने से पहले 
यह कह लूं 
वह कर दूं 
अब यह भी नहीं 
की 
सोच लूं, जाने को जा सकता हूँ 
मैं ही 
उसके जाने के पहले 

२ 

अब 
सोच कर करने की उमंग नहीं है 
अब 
बस देखना भर है 
वह 
जो 
हो जाता हैं मेरे द्वारा 
मेरे न होने की सूरत में 

३ 

इस तरह भी हुआ जाता है 
न होकर 
 
और यूं होना
 ना जाने कैसे 
ले आता है
 उस पूर्णता का रस 
जिसका 
पता भी न था 
हो- होकर होते जाने के अधीर प्रयासों में 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
५ जून २ ० १ ३

Monday, June 3, 2013

फूलों की नई नई घाटियाँ



शब्दों का हाथ थाम 
उतर कर  शिखर से 
आँख मूँद कर 
कुछ देर
अब 
 देखता हूँ 
फूलों की नई नई घाटियाँ 
जहाँ तक ले आये हैं शब्द 

२ 

आविष्कार अपने भीतर 
करना है जिसका 
वह मैं हूँ 
या तुम 
या वह एक 
जिसमें घुल मिलकर 
मैं और तुम 
जब 
अपना अपना परिचय छोड़ कर 
सम्माहित होते 
उस एक मैं 
उम्र आता है 
सारी सृष्टि का सौंदर्य 
और 
पसर जाता है 
 आदि-अंत रहित मौन सा 
 
३ 
 
इस बार भी 
छेड़ कर शाखा शाश्वत वृक्ष की 
भीग लिया हूँ 
करुनामय स्पर्श में 
 
अपने अंतस में 
यह नूतनता की नमी जो है 
इसमें 
खिल रहे  हैं
कृतज्ञता पुष्प 
 
इन्हें तुम्हारी चरणों तक पहुंचाने 
आव्हान कर रहा तुम्हारा 
यह जानते हुए भी की 
हर पुष्प के खिलने में भी 
अनुस्यूत है 
उपस्थिति तुम्हारी 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
३ जून २० १ ३

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...