Saturday, December 22, 2012

मनुष्य होने की दौलत


और फिर 
वहीं से 
देख रहा था अपना शहर वह 
इतने बरसों के बाद 
इस पहाडी से उतना दूर नहीं लगता था शहर 
जैसा पहले था 

न ये डूंगरी ही 
उतनी ऊंची जान पड़ती थी 
जैसी पहले थी 

इतने बरसों में 
बहुत ऊंची हो गयी है बस्ती 
या अपना कद घटा कर 
बस्ती में मिल जाने को आतुर है पहाड़ 

चाहे जो हो 
इस बार 
नहीं था वह तिलिस्म 
जिसके लिए 
कई बड़े बड़े पहाड़ पार करके 
लौटा था 
वो बचपन के शहर में 

अपने आप में 
मुस्कुरा कर 
क्षितिज को देखते हुए 
सोच रहा था वह 
शायद जादू जगाने वाली मेरी आँख भी 
खो गयी है 
अनुभवों के तालाब में 

शायद बस्ती ने 
कर दिया है कोइ नया जादू 
निगलने लगी है 
कद सबका 

पहाड़ बौना 
लोग बौने 

इस बार 
सोच रहा था वह 
आसमान में जाकर 
'ऊंचाई' का बीज लाकर 
सौप देगा बस्ती को 

फैलने की कोशिशों में 
ख़त्म हो चला है जो 
ऊंचे उठने का आकर्षण 

किसी न किसी की साजिश तो है ये 
पर किसकी 

पहाड़ से उतरते हुए 
ढलान ने 
भगाते हुए 
दे दिया उसे उत्तर 
साज़िश 
आसानी से लुढ़कते हुए 
श्रम से बचाने वाली 
एक उस इच्छा की है 
जो 
दिखती तो निश्छल है 
पर अपने चंगुल में 
चुप चाप ले जाती है 
वो संसार हमारा 
जिसमें 
संतोष की दौलत 
अर्जित करनी होती है 
सबको 
अपने अपने तौर पर 

ये कैसा छल है 
जो कंगाल होते होते हमें 
दौलतमंद जताता है 
और हमसे 
मनुष्य होने की दौलत 
छीन कर ले जाता है 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
22 दिसंबर 2012



Thursday, December 13, 2012

तुम्हारी अपार करूणा





1
लिख लिख लिख 
ये कौन है 
थपथपा कर चाह जगाता अभिव्यक्ति की 
शब्दों के बीच 
सहसा अपना मुख दिखलाता 
फिर छुप जाता 
है कौन ये ?

2

शायद जानता हूँ उसे 
इतनी अच्छी तरह 
जैसे की जानता हूँ स्वयं को 
पर 
विस्मृत हो जाती है 
पहचान 
लिख लिख लिख 
स्मरण करवाने 
मेरे होने का 
वही निकल आता 
शब्दों के बीच 
एक निश्चल खिड़की बना कर 

3

यह कैसा खेल है 
बनने और मिटने का 
सब कुछ 
कितने जतन से सजा-सजा कर 
देखते दिखाते 
धीरे धीरे 
हम इस खेल की तरह 
शेष हो जाते 

और 
शून्य तक की इस यात्रा में 
यह जो सूत्र है 
एक आलोकित मुस्कान का 
यही हो न तुम 
या शायद 
यह तो 
एक परावर्तन भर है 
तुम्हारे 
अनंत उल्लास का 
एक नन्हा सा पदचिन्ह 

इसे लेकर भी 
कितना तृप्त हूँ में 
यहाँ तक लाने के लिए ही 
तुमने संभवतया 
रच दी 
खिड़की शब्दों की 
और 
लिख लिख लिख की थपथपाहट में 
अब सुनती है 
तुम्हारी अपार करूणा 

तुम तक पहुँचता है न 
मेरे रोम रोम से फूटता 
यह भाव कृतज्ञता का 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
13 दिसंबर 2012


Tuesday, December 11, 2012

हर मुश्किल कर दे आसान



अब  सुध नहीं है अपनी पहचान की 
उभर रही है गाथा तेरी ही शान की 
सुख देती, संतोष से भर देती है 
 रीत ये रसमय तेरे गुणगान की 

2

आँख नीद आकाश उड़ान 
सारे जग को अपना मान 
एक प्यार में अगणित नुस्खे 
हर मुश्किल कर दे आसान


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
10 दिसंबर 2012

Sunday, December 9, 2012

जेट लेग से समाधि की ओर

(धूप आती है, छाया से बतियाती है - चित्र रुद्रानंद आश्रम, ऊना, हिमाचल प्रदेश 
मोबाइल क्लिक - अशोक व्यास )
1

यह एक कुछ 
जो जेट लेग कहलाता है 
रातों को नींद उड़ाता है 
जगा कर याद दिलाता है 
की उस भूमि से इंसान का गहरा नाता है 
जिसे  वह पीछे छोड़ कर आता है 

2

जागने के बाद 
हमें फिर से जागने होता है 
ताकि 
सोच इस तरह 
सज पाए 
की 
अनंत से अपनापन 
खिल खिल जाए 

3
जेटलेग हमें 
जागने और सोने के बीच 
 एक 
निर्वात में बिठाता है 
और 
चेतना को फिर से 
व्यस्थित होने का अवसर दिलाता है 

हमारी चेष्टाओं को मद्धम करके 
ये बाताता है 
की हम जो हैं, उसका परिचय 
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति
तीनो से 
परे तक जाता है 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 

(जेट लेग से समाधि की ओर )




अर्पण- स्वीकरण से परे


कहने- सुनने से परे 
यह जो सुनता है 
संगीत जीवन का 

मेरे -तुम्हारे से अलग 
यह जो बजता है 
आनंद अपनेपन का 

इसे साथ लेकर 
मुक्त चेतना 
समर्पण दीप से 
उतारती है आरती 
तुम्हारी 
ओ विराट 

और मैं 
इस 
अर्पण- स्वीकरण से परे 
इस क्षण 
देख कर 
यह मिलन 
शून्य में सम्माहित 
स्थिर, निश्चल, शुद्ध 
निर्विकार 
मुग्ध 
महामौन में लीन 

कहने सुनने से परे 
हूँ 
बस हूँ 
ऐसे की जैसे 
हो चला हूँ 
होने न होने से परे 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
8 दिसम्बर 2012 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...