Sunday, November 11, 2012

जीवन होना मंगल है


हो सकता है न 
की अंतिम दिन हो आज ही 
आ जाए बुलावा 
चलना हो छोड़ कर खेल सारा 

यह सम्भावना 
जो झूठ भी नहीं है इतनी 
क्यों की होता आया है 
जाते रहे हैं 
आये हुए लोग 
बिना जाने 
अपने जाने का समय 
पर 
अमंगल लगता है न 
जीवन को खोने का उल्लेख 

यानि 
जीवन होना मंगल है 
पर याद कहाँ रहता है यह भी 
हर दिन

 इसीलिये जलाते हैं दीप 
याद कर राम जी के लौटने को 
लौटते हैं 
हम मंगल चेतना के बोध क्षेत्र में 
दीप के उजियारे से जुड़ कर 
भर देते हैं अंतस में
आलोक
 पावन प्रसन्नता का
और
सुन पाते हैं
 मंगल ध्वनि
साँसों में

दीप पर्व
अपने होने के सौभाग्य की चिर स्मृति का आव्हान है
और इस कल्याणमयी  कनक प्रभा का गुणगान है


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
11 नवम्बर 2012

Tuesday, November 6, 2012

लौटने से पहले


लौटने से पहले
मुड़ कर
देख लिया जिसने
नहीं लौट पाया
आकर्षण स्थल का
जादू की तरह
सो सो कर
फिर जाग जाता है
लिख लिख कर
ढूंढता हूँ
वो संकेत जिसको लेकर
थामे रहता है
मुझे आसमान
और तरसती रहती है धरती
मेरे स्पर्श को

मैं हवाओं के साथ
तैरते हुए
जिस दिन थक जाऊंगा
शायद उस दिन
धरती पर आऊँगा
या शायद उड़ते उड़ते
एक दिन
स्वयं  आकाश हो जाऊँगा

अशोक व्यास

Friday, November 2, 2012

रहस्य की अगणित परते


तो अपने शहर में 
जगह जगह 
गिरे हुए दरख्तों का दर्द सुनते हुए 
कहीं कहीं 
जड़ों सहित उखाड़ दिए गए 
विशाल पेड़ का दर्द महसूस करते हुए 
शक्ति और सौन्दर्य की 
झकझोर देने वाली 
लहरों का 
अपने नगर के कुछ मुहल्लों में 
आ धमकने से उठा कोहराम 
देखते हुए 

वो अब तक सकते में था 
जैसे कोइ हमारे सारे खेल को 
तोड़ ताड कर फेंकने के लिए आया था 
या 
शायद हमें खेल का वो आयाम दिखा देने के लिए चला आया था 
जिसे हम देख नहीं पा रहे हैं 

सुविधाएँ जीवन का पर्याय नहीं हैं 
निश्चितता को स्थाई निवास स्थल नहीं मिलता है 

जीवन का जो जादू है 
उसके साथ रहस्य की अगणित परते हैं 

वो इन सब परतों के पार 
देखने की कोशिः करता तो उसे किसी टूटे हुए मकान का दृश्य असहज कर देता 
उसने सोचा 
धरती माँ से ही पूछ ले 
'माँ आपने कियों किया ऐसा'

फिर देखा 
माँ से संपर्क वाला तार तो 
तूफ़ान के बहुत पहले से टूटा हुआ था 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...