Thursday, July 26, 2012

अक्षय हरियाली



लिखते लिखते 
शब्द श्रंखला
जब सूखी टहनी की तरह 
फलान्वित होने की बाट जोहती 
दिखाई देती है 

शब्द से दूर जाकर 
घने निर्वात में 
घरौंदा बनाता 

फिर 
चुप की चीख से 
घबरा कर 
लौट आता 
शब्दों के सुरक्षित घेरे में 

और 
करता 
प्रतीक्षा 
उस किरण की 
जिसके अनुग्रह स्पर्श से 
रसीली हो जाए 
शब्द श्रंखला 
और 
मन में 
गुनगुनाये 
अक्षय हरियाली 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
26 जुलाई 2012 

Monday, July 23, 2012

वह बेनाम सा कुछ



जीवन न मुट्ठी में है 
न आसमान में 
छुपा हुआ है 
संकेत जीवन का 
उस रिश्ते में 
जो मुट्ठी बनाती है 
आसमान से 

2

जानना कभी पा लेना है 
और कभी 
जानते जानते 
खो भी जाता है 
वह 
जिसे पाया हुआ मान बैठते हैं हम 

3

सच कहूं 
चाहे निकला हूँ 
मगन आपने आप में 
कुछ ऐसे की 
अनजान हूँ 
किसी के होने न होने से 
पर मेरी गति में 
शामिल रहा है 
तुम्हारे होने या ना होने का बोध 

ना जाने क्यूं 
ऐसा है की  
मेरे जीवन को 
अर्थपूर्ण बनाता है 
वह बेनाम सा कुछ 
जिसकी पहचान
 कभी-2 छू भले ही जाती है 
पर पकड़ में कभी नहीं आती है 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
23 जुलाई 2012

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...