Tuesday, November 30, 2010

क्या सभी के साथ होता है ऐसा



क्या सभी के साथ होता है ऐसा
हर दिन
नए सिरे से
पूछना स्वयं से अपना परिचय
और सजा कर 
अपने सामने उपस्थित
सब रंगों वाले भाव, 
निर्धारित कर प्राथमिकता
ढूंढना
सार अपने होने का


क्या सभी के साथ ऐसा होता है
कि कोई तिलिस्म सा टूटता है
किसी क्षण की कोख से
और
खोल कर दिखा देता है
कालातीत का
चिर आश्वस्त मुख


क्या सभी के साथ होता है ऐसा
कि सत्य का संकेत 
देने लगती है 
हर सांस
इस तरह
की बहुत सी
अपेक्षाओं के बंधन
क्षीण हो जाते
अपने आप
और लहराने लगता है
एक भाव
ऐसी मुक्ति का
जो पकड़ में नहीं आती


क्या सबके साथ होता है ऐसा
कि 
किसी एक पल
अकारण 
मन से फूटता है
निर्मल क्षमा का झरना
अपनत्व के उजियारे में
रोम रोम से
फैलने लगता है
प्रेम का प्रकाश

शायद होता है
सबके साथ 
ऐसा
कभी ना कभी
पर परियों के किस्से की तरह
वही इसे सच्चा मानते हैं
जो कहीं ना कहीं अपने आप को
बच्चा मानते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, ३० नवम्बर २०१०

Monday, November 29, 2010

जो हर हलचल में मेरा अपना है

तूफ़ान
जल्दी गुजर गया
इससे पहले की टूटती टहनियां
शायद जड़ों से निकल ही आता वृक्ष
गुजर गया आपा-धापी का दौर
शांत हो  गया
वो एक
झंझावात सा

इस बार
किसी तरह
फिर से लौट आया
सुरक्षित छत के नीचे
तुम्हारा हाथ थाम कर
बिना लहू लुहान हुए
और
कड़कती बिजली की कौंध में
दीख पड़ा
उसका जगमगाता परिचय
जो हर हलचल में मेरा अपना है
और
हर उथल-पुथल में
मेरी पूर्णता को
बचाए रखता है
जिसका सौम्य संकेत

तूफ़ान के पार
लाने वाले के
साथ साथ
कृतज्ञता पूर्ण प्रणाम है
तूफ़ान को भी
जो मुझे हिला हिला कर
'मूल' की
याद दिलाता है

मूल' वह
जिसे कोई हिला नहीं
पाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२९ नवम्बर 2010

Saturday, November 27, 2010

निश्छल प्यार

प्रार्थना
रूप रंग बदलती है
समय के साथ
चाहतों की तस्वीर
बदल देते
नए नए हालात

तो वह सब
जो मैंने कभी माँगा था
जो तुम दे भी चुके हो मुझे शायद
अब प्रासंगिक नहीं लगता
और
आज सुबह सोचता हूँ
क्या मांगूं तुमसे
जो हमेशा बना रहे प्रासंगिक

मैं कैसे उपयोगी बनाऊँ अपना जीवन
सोच सोच कर
हर बार
नहीं देख पाता
किसी योजना का आकार
बस इतना चाहता हूँ 
जाग्रत हो मुझमें
हर हाल में बना रहने वाला
निश्छल प्यार
इसी से 
खनक जायेगी 
प्रासंगिकता की
नित्य झंकार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ नवम्बर 2010

Thursday, November 25, 2010

मेरे समर्पण की धारा

और फिर
नए सिरे से
बात तुम्हारी
पलट पलट कर
देखता हूँ
अर्थ अपने होने का,
जहाँ हूँ
वहां भी
 निखर आती है पूर्णता 
मेरे चारों ओर जो
करती है प्रमाणित
तुम दूर नहीं हो मुझसे
कभी भी
कहीं भी
और होती है आश्वस्ति
मेरे समर्पण की धारा
पहुँच रही है
तुम्हारे चरणों तक


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
25 नवम्बर 2010

Wednesday, November 24, 2010

लो प्रेम रंग सा छिटका है



 
मुझमें एक बात कुवांरी है
जिसको ये दुनिया प्यारी है

अनछुई रहे सबमें मिल कर 
 नूतनता की अधिकारी है
 
मेरी बाँहों में थमी रहे
ये आंधी की लाचारी है
 
 लो प्रेम रंग सा छिटका है 
सुन्दर यह सृष्टि सारी है
 
अपनेपन का सन्देश लिए
मुझमें ये ज्योति तुम्हारी है
ये मौन मधुर सा पसर रहा 
शाश्वत सुख, सांस हमारी है
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, २४ नवम्बर २०१०
 
 
 

Tuesday, November 23, 2010

ये तो किस्सा सुना-सुनाया है


धूप को आईना दिखाया है
उजाला और भी बढाया है

लोग जो भी कहें, सो कहते रहें 
मैंने तो बस तुम्हें बुलाया है

एक नज़र का सलाम लेकर ही
आज फिर से कोई शरमाया है

बात खुद तो बड़ी पुरानी है
लहर पे उसका नया साया है

 चांदनी का सितार बजता है
कोई धड़कन में गुनगुनाया है

पास में मिटने का अंदेशा है
इसलिए फासला बढ़ाया है
 
नया लगने लगा है क्यूं फिर से 
 ये तो किस्सा सुना-सुनाया है
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
२३ नवम्बर २०१०, मंगलवार




Monday, November 22, 2010

साँसों में सजा है अनंत का उपहार


 साँसों में सजा है अनंत का उपहार
संकेत मात्र से मिल जाता है संसार
 
उसकी दृष्टि से मुखरित है असीम 
जाग्रत है प्यार की अनवरत धार 
उसका होने से हो जाता है सब कुछ
खुल जाता है हर एक बात का सार
 
वह जब चाहे छुड़ा कर सीमा का खेल
खोल देता है नित्य विस्तृत विस्तार 
लो, अनंत वैभव में दमकता मन लेकर
चला मैं मंगल कामना के रथ पर सवार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, २२ नवम्बर २०१०





Sunday, November 21, 2010

मौन मेरा इतना सुन्दर करने वाला




मौन मेरा इतना सुन्दर करने वाला 
खोल रहा हर एक पहेली का ताला
 
 निश्छल प्रेम झरे है मेरे अंतस में
लिए चलूँ साँसों में पावन मधुशाला
 
कई बरस तक गंध रही मेरेपन की
अब मुझसे हो मुक्त हुई उसकी माला

चल मन मौज मनाने के दिन आये हैं
आत्मसुधारस पीकर होले मतवाला
 
सारे बंधन भस्म हो गये क्षण भर में
कृपा किरण ने अद्भुत जादू कर डाला 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, २१ नवम्बर २०१०





 
, अचरज है

Saturday, November 20, 2010

देता है दिन रात तराने मस्ती के

 
देता है दिन रात तराने मस्ती के
रंग हुए गुलज़ार हमारी बस्ती के
 
हुए नए किस्से रोशन इतने सारे 
चर्चे हैं हर ओर तुम्हारी हस्ती के

नए-नए गुर सीख-सीख कर जाना है
सच्चे साथी, गीत तुम्हारी मस्ती के
 
बीच नदी के लगे किनारे आ पहुंचे
तुम हो खेवनहार हमारी  कश्ती के
 
अपने से बाहर झांके का वक़्त जिसे
वही सुनाये हाल हमारी बस्ती के

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, २० नवम्बर २०१०





Friday, November 19, 2010

पूर्णता की पहचान



लौटने से पहले
अपनी निशानियाँ 
छोड़ने की चाह,
या
जो कुछ है
उसे समेट कर 
चल देने का उत्साह,
 
दोनों ही सूरतों में 
वर्तमान 
प्यासा रह जाता
हमारे ध्यान का,
नहीं देख पाते
हर क्षण में छुपा
एक सूत्र
पूर्णता की पहचान का


अशोक व्यास
शुक्रवार, १९ नवम्बर 2010

Thursday, November 18, 2010

है सारा संसार तुम्हारे बस्ते में

है सारा संसार तुम्हारे बस्ते में
फैला प्यार अपार तुम्हारे रस्ते में
जीने की ख्वाहिश का ऐसे मान करो 
खिलता जाए सार तुम्हारे रस्ते में
बुरा मिले तो उसमें भी इतना देखो 
चुकता हुआ उधार, तुम्हारे रस्ते में
एक कामना शाश्वत तक ले आती है
बाकी तो है ज्वार, तुम्हारे रस्ते में
तुम अपने चेहरे को अपना मत मानो 
कहता रंगा सियार, तुम्हारे रस्ते में
गौर से देखोगे तो सब दिख जाएगा 
छुप कर रहे बहार, तुम्हारे रस्ते में

अशोक व्यास, 
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, १८ नवम्बर २०१०

Wednesday, November 17, 2010

सिर्फ माटी बनने से ना होगा

 
अकुलाहट उड़ान की
नए सिरे से
थपथपा कर कभी-कभी
अपने आप तक 
पहुँचने के 
नए पथ का 
आविष्कार करने की
प्रेरणा लेकर आती है
 
ऐसे में 
मैं कुम्हार के हाथ की
गीली माटी की तरह 
नए रूप में
गढे जाने को तैयार 
जब 
विराट कुम्हार को देखता हूँ 
उसकी विस्तृत आश्वस्ति 
देती है संकेत 
सिर्फ माटी बनने से ना होगा 
इस खेल में
कुम्हार भी बनना है तुम्हे ही 
मुझे स्मृति में रख कर
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१७ नवम्बर २०१० 

Tuesday, November 16, 2010

सतत सुन्दर गति

 
 
 
 
 
 
 
 

 
गाँठ खुलने के बाद
होती है
एक जो
सफलता की अनुभूति
उमड़ता है उसमें
आनंद का कोरा उजाला
उस पल के सौंदर्य से
जगमग होता पथ
गांठें खोलते-खोलते
कभी तो
पहुँच जायेंगे
गंतव्य तक
हम,
 क्या 
उस मुक्त अवस्था को
साथ लेकर भी
संभव है
सतत सुन्दर गति?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ नवम्बर २०१०

Monday, November 15, 2010

शायद तुम आ जाओ




 
कभी-कभी 
दिन भर में
चाहे वह हो भी जाए 
जो सोचा था
खालीपन की एक खिड़की
कहीं खुली रह जाती है
 
अनाम ठण्ड से
घिर कर मन
चाहता है
किसी सपने की गर्माहट
 
ऐसे में
करने लगता हूं
वह सभी उपाय
जिनसे तुम तक पहुंचा जा सके
और फिर हार कर
इस एक महीन सी आस पर
टिक जाती हैं धड़कने 
शायद तुम आ जाओ
अपने आप
बिना बुलाये
ऐसे जैसे कि कोई
अपने घर में आकर
बत्ती जलाता है
उजियारा छा जाता है
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ नवम्बर २०१०

Sunday, November 14, 2010

अपनी पहचान भुलाये बिना

 
क्यूं ऐसा होता है
भीड़ में
खो जाता है
मेरा एक विचार
बढ़ता हूँ 
लेकर गति
और दिशा 
औरों से उधार

गंतव्य पर
पहुँच कर भी
अधूरापन करता है
 सत्कार
तो निष्कर्ष ये है कि 
सतर्कता को
और प्रखर बनाना है
इस बार
 
स्वयं को
औरों से ही नहीं
अपने दिशाभ्रम से भी
बचाना है
भीड़ में
अपनी पहचान भुलाये बिना,
धीरे धीरे
आगे निकल जाना है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, १४ नवम्बर 2010




Saturday, November 13, 2010

सघन मौन का माधुर्य

 
मैंने
आभार की खिड़की खोली
कृतज्ञता की किरणों से जगमग करते आँगन में
आत्म-सौंदर्य का
अनछुआ आलोक
पसर गया

साँसों में
अनाम उल्लास का उजियारा फूटा
समर्पण की चहचहाहट करती
एक सौम्य चिड़िया ने 
दृष्टि मात्र से
गूंथ दिए
जीवन के सब बिखरे हिस्से

अब यह जो
सघन मौन का माधुर्य है
इसे लेकर
पारदर्शी हो गयी हैं
घर की दीवारें
या शायद
अब दीवार नहीं कोई
सृष्टि के इस छोर से उस छोर तक
जो फैलाव है
वही मेरा घर है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ नवम्बर 2010

Friday, November 12, 2010

रंग तुम्हारे प्यार के



कोरा मन लेकर
कैसे आऊँ अब
तुम्हारे सामने
 
रंग तुम्हारे प्यार के
खिल गये हैं
इस तरह मुझमें 
 
कि अब ना मैं हूँ
ना मन ही मेरा
जो कुछ है बस
प्यार है तुम्हारा
 
और अब यूँ भी होना लगा है
अपना चेहरा देखते हुए 
बस प्यार का सागर दिखता है
जिसमें 
झिलमिलाती है
सारी सृष्टि तुम्हारी 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ नवम्बर 2010
 

Thursday, November 11, 2010

ये कविता कंप्यूटर के विरोध में नहीं





ठेले वाला
मेले में
पुकार पुकार कर
चाट के स्वाद की
घोषणा कर रहा हो जैसे

क्या हम भी
भीतर के सुन्दरतम की 
महिमा जोर- जोर से गाकर
लोगों को बताएं
या अपने- आप में मगन
मधुर मौन रस में घुलते जाएँ 
 
२ 
 
तब जब कंप्यूटर नहीं था 
चल तो रही थी दुनिया 
शायद गति कम थी
शायद सुविधाएँ कम थी
पहले पहले
बड़े आकार के कंप्यूटर ने 
दफ्तरों की शोभा बढाई 
थोड़ी बहुत उत्तेजना बढाई
 
अब कंप्यूटर के चमत्कार 
हमारी जेब, हमारे ब्रीफकेस में
हमसफ़र तो हैं ही 
घर में सबसे पसंदीदा स्थल भी बनते जा रहे हैं
 
कंप्यूटर हमारे लिए 
नित्य जाग्रत धूनी की तरह हैं
स्क्रीन खोलती है कितने आकाश 
इस अद्भुत यन्त्र ने
विस्तार के साथ साथ
सीमित भी कर दिया है हमें 
इस हद तक की
प्रेमी-प्रेमिका 
समुद्री तट पर पहुँच कर भी
ना समुद्र को देखते हैं
ना एक-दूसरे को,
अपने-अपने लैपटॉप को 
गोद में लिए
कहीं और की सैर करते हैं


ये कविता कंप्यूटर के विरोध में नहीं
बस एक चेतावनी है
कंप्यूटर अपने आप में
नहीं कर सकेगा हमारा विकास

कंप्यूटर धीरे धीरे
रिश्तों में प्रतिद्वंदिता तो ला ही रहा है
अपनी सम्भावनाओं के द्वारा 
आन्तरिक यात्रा को भी धुंधला रहा है
 
आतंरिक-विकास
 नित्य शांति,
और चिर-प्रसन्नता के लिए
अब भी हमें
वही रास्ता, वही विधि अपनानी होगी 
जो कभी ऋषि-मुनियों ने अपनाई
 
"शून्य" और "एक" का आधार लेकर 
विस्मित करने वाला कंप्यूटर
अगर हमसे संवाद करता 
तो शायद बता देता कि 
जो कुछ सामने है
उसमें 
'शून्य' भी है
और 'एक' भी है
 
पर जो कुछ सामने है
उसमें उलझ कर
ना हम 'शून्य' तक जा सकते हैं
ना 'एक' को पा सकते हैं
 
जो दिखाई देता है
उसके आधार तक जाए बिना 
नहीं पाया जा सकता सत्य को
 
यह बात 
कंप्यूटर से भी सीख पाने की पात्रता
वह ऋषि जगाता है
जो 
'आदि-अंत' से परे की
उपस्थिति में तन्मय हो जाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ नवम्बर २०१०
 
 

 


Wednesday, November 10, 2010

मन का उन्नत उजियारा

 
वह सब
जो जाना हुआ है 
उसका कोई एक हिस्सा भी
साथ नहीं रहता निरंतर
 
पर संगत करता है
चिंतन यात्रा में
ज्ञान का पचा हुआ एक
स्वर्णिम कण

और
सृष्टि के मर्म को
अपना सम्पूर्ण अर्पित कर
आनंद में थिरकता है जब जाग्रत मन

 शुभ्र भावों का पुंज बना मैं
सबके लिए 
मंगल कामनाएं भेजता हूँ
अपनी हर सांस के साथ

ना जाने कैसे
आश्वस्ति सी
कहीं गहरे पैंठ गयी है
ऋषि कृपा से 
कि
मेरा कल्याण
सबके कल्याण से
अलग ना है
ना हो सकता है कभी

लो
इस सूक्ष्म, संवेदनात्मक दृष्टि से 
दिखलाते हैं तपस्वी दृष्टा
मन का उन्नत उजियारा भी
हवा और धूप की तरह
साझा है सबका

ना कोई बड़ा
नो कोई छोटा
मानवता का गौरव
सबके लिए है
सबमें है
सबसे है

जय हो

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ नवम्बर २०१०

 

 

Tuesday, November 9, 2010

उमड़ गया पावन उजियारा


लो  फिर सहसा
उमड़ गया पावन उजियारा
बह निकली अनायास
चिर प्रसन्नता की धारा
 
२ 
लो फिर सहसा
मैंने तुमको पुकारा
जगमगा उठा
बोध जगत सारा
 
३ 
आनंद के यह 
अनछुए पल
इनमें गाये
अनंत निश्छल
 
४ 
एक नाद ऐसा
कण कण कर दे प्यारा
लो फिर सहसा
उमड़ गया पावन उजियारा


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
९ नवम्बर २०१०
 


 

Monday, November 8, 2010

मेरे होने का प्रमाण


अब कविता नहीं लिखता
कविता के बहाने
देखता हूँ
अपने आपको
 
कुछ नए रास्ते
कुछ नए वृक्ष
बहती नदियाँ
पहाड़, आसमान और जंगल
नए नए से
ना जाने कैसे
हुए हैं प्रकट
मेरे भीतर 
मुझे परिवर्तित किये बिना
 
इसी विस्मय के चिन्ह
सहेज कर चेतना से
सजाता हूँ
आनंद की ज्योतिर्मय थाली पर
शब्दों के अनुग्रह से
 
कह लेता हूँ
इसी को कविता
वस्तुतः यह कविता नहीं
मेरे होने का प्रमाण है
 
मेरा होना
एक अपरिवर्तनीय आधार पर
नूतनता का नित्य अनुसंधान है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ नवम्बर २०१०

Sunday, November 7, 2010

और फिर नए सिरे से...





और
फिर नए सिरे से
जब शुरू हुआ जीवन
बच्चे ने आसमान से पहले 'फेसबुक' देखा
जन्मपत्री से पहले बनवा दिया गया उसका 'ईमेल' अकाउंट 
 
२ 
 
और
फिर नए सिरे से
दुनिया का परिचय बताने
माँ ने 'स्काइप' से बच्चे को
दिखवा दिए 
कार, ट्रेन, हवाईजहाज
फिर पेड़, नदी, पहाड़ की बारी आने तक
नींद आ गयी थी बच्चे को


और फिर
नए सिरे से
माँ जब दे रही थी
परिचय 'डिगिटल फोटोफ्रेम' से
चाचा-चाची, मामा-मामी, दादा-दादी, नाना-नानी का
साथ में 
फुसफुसा कर कहा उसने
'इन सबसे सावधान रहना'

4

और फिर
नए सिरे से
सोचने लगा कवि
कैसे बदले 
सत्य के 'तात्कालिक रंग'
कैसे बदले
जगत से जुड़ने का ढंग 
कैसे बढे प्रेम और विश्वास
कैसे सहज आत्मीयता का हो विकास


और फिर 
नए सिरे से
यही समाधान आया उसके पास
माँ-माँ 
तुम ना बदलो
तुम ही हो मानवता की आस


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
रविव्वर, ७ नवम्बर २०१०
 

 


Saturday, November 6, 2010

रोम रोम आनंद सुनाये




 
दीप पर्व की बात निराली
चेहरे पर खुशियों की लाली
फसल उमंगो की लहराई
नींव सृजन की नूतन डाली
 
 
 
राम नाम का सार खिलाये
ज्योति पर्व मन मंगल गाये
मधुर मौन में रमा हुआ मैं
रोम रोम आनंद सुनाये
 

 
वो सच्चा जो सच को ध्याये 
उसे याद कर मन खिल जाए
खिले हुए मन की आभा से 
गहन अँधेरा भी मिट जाए

जय श्री कृष्ण 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, ६ नवम्बर 2010

Friday, November 5, 2010

दीपोत्सव पर ज्योतिर्मय शुभ कामनाएं

 
आनंद आनंद आनंद उज्जवल
पग पग पावन, हर पल मंगल

दीप पर्व का उजियारा
सारा जग लगता प्यारा
प्रेम और विश्वास लिए
शुभ भाव की नव धारा

जय हो
मंगल हो
शांति, समृद्धि, प्रेम, समन्वय, यश पायें
दीपोत्सव पर ज्योतिर्मय शुभ कामनाएं
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
५ नवम्बर २०१०

Thursday, November 4, 2010

बात बदलती है रंग

(गणपति जी के स्वरुप सा नाम- वेंकटेश)
 
बात बदलती है रंग अपने नज़र के साथ
अचानक हो जाती है खुशियों की बरसात

जहाँ पहुंचा मैं तेरी याद की चादर लेकर
 मेरे पीछे चली आयी कोई एक चांदनी रात 
 
बहकता है कोई हिरन सा कई सदियों से
साथ है जो, लगे है, छूट गया उसका साथ

पुकार मेरी शिखर तक पहुँच खामोश हुई
 बराबर हो गए मेरे लिए अब दिन और रात
 
उदास शहर में खुशबू का नया झोंका है
गंध माटी की लिए झूम गए मेरे हाथ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ नवम्बर २०१०

 
 


Wednesday, November 3, 2010

उत्सव सा यह है जो भीतर

 
 
उत्सव सा यह 
है जो भीतर
नई उमंगो का
यह निर्झर
सांस सांस से
मुखरित होती
जैसे कोई
दिव्य धरोहर


उजियारे का 
करने स्वागत
मुझमें फिर 
मुस्काया शाश्वत
जो जो 
प्यार बढ़ाना चाहे
मैं उससे 
होता हूँ सहमत


आज कामना
रूप नया लेकर आई है
लेन-देन से परे
समर्पण रुत छाई है
साफ़ दिखे है
अब संदेह नहीं है कोई 
ज्योति संग भी 
चले ज्योति की परछाई है
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
३ नवम्बर २०१०

Tuesday, November 2, 2010

विराट मौन के स्पंदन

                                                                           (चित्र-ललित शाह)
 
देखता हूँ
वह जो दिखता है
एक दिन मिट जाएगा 
पर
वह जो अमिट है
मिटने वाली आँख में तो
वह भी मिट जायेगा 

अब तलाश है
ना मिटने वाली दृष्टि की
जिससे जुडी है
उपस्थिति सृष्टि की

जिससे
आनंद का अनाम रस सागर लहराता है
वही
 अनंत बोध बन कर मुखरित हो जाता है 
 
पर इस विराट मौन के स्पंदन वही सुन पाता है
जो स्वयं मौन रहने का अभ्यास कर पाता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका

 

Monday, November 1, 2010

निर्मल मौन



इस क्षण से जुड़ने
छोड़ देना है जो कुछ
उसकी याद मिटाने का रबर नहीं है मेरे पास,
बस इस क्षण की चमक 
उजागर करने
शुद्ध माध्यम बनने का करता हूँ प्रयास 
 
इस तरह 
 निर्मल मौन लेकर
प्रकट होती है प्रेम की छलछलाती धार
जिसमें सहज हो जाते 
शांति, समन्वय 
करूणा, आत्मीयता और विस्तार 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१ नवम्बर २०१०



आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...